संवाददाता- अंकित पाण्डेय
निफरा में आयोजित नवचंडी महायज्ञ में शामिल हुए स्वामी नारायणानंद तीर्थ।

मिर्जापुर। छानबे क्षेत्र निफरा गांव में आयोजित दो दिवसीय आध्यात्मिक सत्संग और नवचंडी महायज्ञ के पहले दिन श्री काशी धर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महराज के सानिध्य में किया गया है। जहां पर आध्यात्मिक सत्संग, नवचंडी महायज्ञ के अलावा गुरूदीक्षा पादुका पूजन का आयोजन किया गया।
प्रवचन में संबोधित करते हुए स्वामी नारायणानंद तीर्थ ने कहा कि सनातन धर्म की प्रारंभिक शिक्षा यह है कि पहले भगवान की बनिये। ऐसा हो जाने पर खुद भगवान के अनुकूल कार्य करेंगे। भगवान फिर हमारे मन में प्रकट हो जायेगें। भगवान के मन से अपने मन से मिलाना भक्ति है। जिसके लिए अनेक साधन की बात कही गई है। भक्ति में समर्पण जरूरी है। इसके अलावा एक ऐसी सूक्ष्म वस्तु रहती है जो मालूम नही रहती है। समर्पण करने वाला उस से बचा रहता है। संसार के लोग जो साधन भजन करते है वह लौट कर आता है। जिसमें अहम की भी भावना रहती है। जिससे ईश्वर की पूजा अहम पूजा ले लेती है। अहम की पूजा से कैसे बचे? यह ध्यान रखना जरूरी है। भगवान और शरणागत का भाव एक ही है लेकिन इसके लिए समर्पण जरूरी है। जहां अपना बल काम नही देता वही सच्ची सरणागत होती है। जहां अपना बल आगे रहता है वहां भक्ति के जगह अहम मिलता है। तत्व के सत्य को किसी सद्गुरु से समझना जरूरी है। क्योकि ऐसे जीव को कोई धोखा नही दे सकता है। संसार के प्राणी जो भी करते है वह अहम की पूजा के लिए करते है। ऐसा करने पर भी कही न कही परमात्मा की पूजा होती है। भगवान की प्राप्ति के लिए धर्मों का पालन करते हुए प्राप्त कर सकता है। जब मन किसी विषय का आकार ग्रहण करता है तो वह अभाव ग्रहण करता है। दुनिया में मन ही है जो लोगो को अच्छा और बुरा कर्म कराता है। जो मनन करते है तो वही स्थिति मन हो जाता है। जब मन विषय से रहित हो जाता है तब वह स्थिति चेतन मन बन जाता है। जब परमात्मा से अलग मालूम न पडे तब वह मनमना होता है। मन निराकार रहे तो परमात्मा जब साकार रहे तो मन होता है। जहां परमात्मा और ज्ञान एक होता है वह मनमना होता है। इस मौके पर मुख्य यजमान धर्मेश पाण्डेय समेत गोपाल जी पाण्डेय, उधौजी पाण्डेय,भोलानाथ पाण्डेय, श्यामजी पाण्डेय, रामजी पाण्डेय, विष्णु पाण्डेय, राजेन्द्र सिंह, अशोक मिश्र, विजय मिश्र समेत काफी संख्या में लोग मौजूद रहे।